मंगलवार, 28 मई 2013

तेरी मसरूफियत और मेरी मजबूरी



समझता हूँ तेरी मसरूफियत को भी 
 जानता हूँ तेरी घबराहट को भी 
 तेरी हर एक झिझक का अंदाजा है मुझे 

 मेरी मजबूरियों को भी तू समझ 
 इंतज़ार के सिवा ना कोई  
 ना कोई आसरा न कोई रास्ता मेरा 

 - - अजय

5 टिप्‍पणियां:

  1. इंतज़ार के सिवा ना कोई
    ना कोई आसरा न कोई रास्ता मेरा
    वाह... बहुत खूबसूरत अहसास...आभार

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  2. वाह... उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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